कलि के पापों का नाश करता है हरे कृष्ण महामंत्र : हरेप्रिया 

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 हरिनाम की महिमा के साथ किया सुदामा चरित्र, रुक्मणि विवाह का वर्णन

 भोपाल। ‘हरे राम हरे राम, राम राम हरे-हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥’ यह नाम मंत्र कलि के पापों का नाश करने वाला है। इससे श्रेष्ठ अन्य कोई उपाय वेद- पुराणों में भी देखने को नहीं मिलता। इस महामंत्र द्वारा षोडश कलाओं से आवृत्त जीव के आवरण नष्ट हो जाते हैं। तत्पश्चात जैसे बादल के छंट जाने पर सूर्य की किरणें प्रकाशित हो उठती हैं, उसी तरह परब्रह्म का स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। ये उद्गार बाल कथावाचक भगवतदासी हरेप्रिया ने टीन शेड स्थित मां वैष्णव धाम आदर्श नौ दुर्गा मंदिर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दौरान शनिवार को व्यक्त किए। कथा के विश्राम विश्राम दिवस पर नाम मंत्र का वर्णन करते हुए बाल आचार्य हरेप्रिया ने कहा कि देवर्षि नारद द्वारा नाम मंत्र के जप की विधि पूछने पर ब्रह्मा जी ने स्पष्ट कहा था कि इस मंत्र के जप की कोई विशिष्ट विधि नहीं है। कोई पवित्र हो या अपवित्र, इस नाममंत्र का निरंतर जप करने वाला मुक्ति को प्राप्त करता है। इसी तरह महादेव भगवान शंकर ने भगवती पार्वती को कलियुग में जीवों की मुक्ति का उपाय बताते हुए इस महामंत्र की उपयोगिता का रहस्योद्घाटन करते  हुए बताया कि कलियुग में श्री हरि-नाम के बिना कोई भी साधन सरलता से पापों को नष्ट नहीं कर सकता। कलियुग में इस महामंत्र का संकीर्तन करने मात्र से प्राणी मुक्ति के अधिकारी बन सकते हैं। कथा के मुख्य यजमान डीएसपी जीएस  राजपूत, आयोजक पं. चंद्रशेखर तिवारी आदि ने व्यास पूजन किया।
-सुदामा ने विपत्ति में भी कुछ नहीं मांगा :
कथा विश्राम से पहले व्यास पीठ को नमन करते हुए  बाल कथावाचक हरेप्रिया ने सुदामा चरित्र और रुक्मणि विवाह का प्रसंग संगीतमय सुमधुर स्वर में सविस्तार प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सुदामा के जीवन में भगवान श्रीकृष्ण जिस दिन आए, उसी दिन से उन्होंने भगवान को अपना मित्र बना लिया और संकल्प लिया कि जीवनभर तो क्या जन्मोजन्म में भी इनको नहीं छोड़ूंगा। हालांकि सुदामा के जीवन में बहुत विपत्तियां आर्इं। घर में खाने के लिए एक दाना तक नहीं रहा। भूखे और प्यासे रहे, परंतु कभी परमात्मा (श्रीकृष्ण)के नाम को नहीं छोड़ा। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जीवन में चाहे कितनी भी विपत्तियां क्यों न आए, परंतु मैं भगवान से कुछ नहीं मांगूगा। विपत्तियां आने पर केवल ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे’ ही सुमिरन करते रहे। अंतत: भगवान ने सुदामा को वह सब कुछ दिया जो कभी किसी को नहीं मिला। वह जान भी नहीं पाए कि उनकी टूटी सी झोंपड़ी पर महल कब बन गया।  उधर भगवान की महिमा सुनकर रुक्मणि ने भी प्रतिज्ञा कर ली कि ‘श्रीकृष्ण से ही विवाह करूंगी’। और उन्होंने सारे रिश्ते-नाते तोड़कर, राजमहल सहित सभी राजसी आन-बान और शान छोड़कर श्रीकृष्ण को ही अपना वर चुना।
कलियुग में भी सबसे प्रबल है नाम मंत्र:
भगवतदासी हरेप्रिया ने बताया कि कलियुग में भगवान की प्राप्ति का सबसे सरल किंतु सबसे प्रबल साधन उनका नाममंत्र जप ही है। राजा परीक्षित के पूछने पर सुकदेव मुनि ने भगवत्भक्ति के अनेक प्रसंगों के माध्यम से उनका मोह दूर किया। उन्होंने कहा कि यद्यपि कलियुग दोषों का भंडार है, तथापि इसमें एक बहुत बड़ा सद्गुण भी है। वह यह है कि सतयुग में भगवान के ध्यान (तप) द्वारा, त्रेतायुग में यज्ञ-अनुष्ठान के द्वारा, द्वापर में पूजा-अर्चना से जो फल मिलता था, कलियुग में वही पुण्यफल श्रीहरि के नाम संकीर्तन मात्र से प्राप्त हो जाता है।
संकीर्तन में डूब गए श्रोता :
भागवत कथा के दौरान व्यासपीठ को सुशोभित रहे एक और बालक कृष्ण दास ने श्रोताओं को हरि नाम की महिमा बताते हुए संगीतमय   हरि नाम संकीर्तन कराया। बालस्वर में संगीत पर हुए नाम संकीर्तन में डूबे हजारों श्रोता बार-बार झूम उठे। तथ्पश्चात कथा विश्राम और पूर्णाहुति यज्ञ के बाद विशाल भंडारा हुआ, जिसमें करीब 5 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने महाप्रसादी ग्रहण की।

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