6 से 20 सितंबर 15 दिन मनेंगे श्राद्ध, पंचमी और षष्ठी तिथि 11 सितंबर को एक साथ 

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श्राद्ध में श्रद्धा के साथ होगा पितरों का तर्पण, तीर्थदर्शन का भी है महत्व
शुभारंभ और समापन दोनों बुधवार को, बनेगा संवत्सर के राजा बुध का महासंयोग
 भोपाल। भाद्रपद मास की पूर्णिमा यानि 6 सिंतबर को प्रारंभ हो रहे श्राद्ध पक्ष में पितरों का श्रद्धा से तर्पण किया जाएगा। इस बार 6 से 20सितंबर तक 15 दिन का श्राद्ध पक्ष होगा। मां चामुंडा दरबार के पुजारी गुरु पं. रामजीवन दुबे एवं ज्योतिषाचार्य विनोद रावत ने बताया कि सोलह श्राद्ध पितृ पक्ष 6 सितंबर से प्रारंभ होगा। पंचमी और षष्ठी तिथि 11 सितंबर को एक साथ मनाई जाएगी, इसलिए इस बार सोलह दिन के न होकर पंद्रह दिन के श्राद्ध होंगे। श्र्उन्होंने कहा कि श्राद्ध का शुभारंभ एवं समापन भी बुधवार को होगा। संवत्सर के राजा भी बुध हैं, जिससे श्राद्ध का महत्व अधिक बढ़ गया है। दरअसल श्री गणेश जी का दिन भी बुधवार माना गया है।  पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक श्राद्ध श्रद्धा के साथ अपने पूर्वजों के प्रति तर्पण किया जाएगा। पं. दुबे ने कहा कि श्राद्ध के द ौरान पवित्र नदियों में सुबह जाकर कुशा, दूध, पानी, तिल के साथ पूर्वजों का तर्पण किया जाता है। देव, ऋषि और पितरों का ऋण इनकी मुक्ति के लिए सोलह श्राद्ध किए जाते हैं। पूर्वजों की मृत्यु की तिथि अनुसार श्राद्ध का महत्व बताया है। यह परंपरा त्रेता और द्वापर से कलियुग में भी कायम हैं। ज्योतिषानुसार पितृ तर्पण का प्रारंभ पूर्णिमा श्राद्ध 6 सितंबर से लेकर पितृमोक्ष अमावस्या 20 सितंबर बुधवार को पितृ विसर्जन का समापन होगा।
श्राद्ध के लिए गंगा का अवतरण :
गुरुजी पं. दुबे ने  बताया कि सूर्यवंशी राजा भागीरथ ने पितरों की मुक्ति के लिए गंगा जी को पृथ्वी पर अवतरण के लिए तप किया। गंगा जी द्वारा उद्धार हुआ। भगवान श्रीराम ने अपने पिताश्री का श्राद्ध किया। आज श्राद्ध करना अति सरल एवं सुगम है। हम माताश्री, पिताश्री एवं पूर्वजों को पितृ कहते हैं, जो शरीर से आज हमारे बीच नहीं रहे। मृत्यु की तिथि को ही हम उनका श्राद्ध करते है। काम, क्रोध, मद तथा लोभ का त्याग कर तन, मन, धन से तर्पण, ग्रास, होम, ब्राह्मण भोजन, दान पुण्य श्राद्ध में करते है। मान, सम्मान, लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। मन को शांति मिलती है। गुरुजी कहते है कि श्राद्ध अब मात्र खानापूर्ति बन गया है। इसमें सुधार करना चाहिए।
श्राद्ध में तीर्थदर्शन का महत्व :
 गुरुजी का कहना है कि जिनके माता-पिता जीवित हैं, उन्हें श्राद्ध पक्ष में तीर्थयात्रा कराना चाहिए एवं उन्हें चाय, नाश्ता, भोजन कराने के साथ वस्त्र, दक्षिणा देकर चरणस्पर्श कर आशीर्वाद लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि श्राद्ध का श्रद्धा से गहरा संबंध है। संतान दिल खोलकर माता-पिता के प्रति तन,मन, धन से श्रद्धा के साथ समर्पित रहे। जिनके पूर्वज जीवित न रहे उन्हें श्रद्धा के साथ गया, इलाहाबाद, हरिद्वार, नर्मदा, क्षिप्रा या पवित्र नदियों के घाट पर श्राद्ध की पूजा-पाठ, पिंडदान, तर्पण आदि करना चाहिए। पितृदोष मुक्ति का निवारण सोलह श्राद्ध में करना चाहिए।
पितरों से की जाएं प्रार्थना :
जन्म आपने दिया, नामकरण, लालन-पालन, शिक्षा, सर्विस, व्यापार, भवन, शादी, संतान प्राप्ति, मान-सम्मान तथा लक्ष्मी आपसे मिली। रग-रग में बहता खून आपका ही है। शुभ कर्म मेरे शरीर से हो, यही आशीर्वाद आपसे मिले। श्राद्ध पक्ष में यह प्रार्थना अपने पितरों से करना चाहिए।

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