सर्वार्थसिद्धि योग में बुधादिष्टमी के साथ होगी महालक्ष्मी पूजा

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भोपाल। भोपाल मां चामुण्डा दरबार के पुजारी गुरु पं. रामजीवन दुबे एवं ज्योतिषाचार्य विनोद रावत ने बताया कि अश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी बुधवार 13 सि बर को सर्वार्थसिद्धि योग के साथ संवत्सर का राजा बुध का दिन होने से बुधादिष्टमी को गौधूलि, लाभ, स्थिर लगन कुंभ एवं शुभ में महालक्ष्मी की पूजा सुहागवती महिलाओं के द्वारा की जावेगी। प्रात:काल 16 बार पानी अपने ऊपर गडुआ डालकर स्नान करती है एवं व्रत धारण करती है।

सायंकाल में 16 प्रकार के पकवान बनाकर मिट्टी के हाथी पर विराजमान महालक्ष्मी की 16 दीपक जलाकर, पूजा-पाठ एवं कथा, हवन, आरती के बाद महालक्ष्मी एवं चन्द्रदेवता को अघ्र्य देकर अपना व्रत खोलती है। कच्चे सूत में 16 गठान लगाकर पीले रंग से रंगकर दुर्बा को उस गढ़े से बांधा जाता है। महालक्ष्मी जी को पीला वस्त्र पहनाकर पूजा के बाद उस वस्त्र से चीर निकालकर अपनी साड़ी के पल्लू में बांधती है ताकि परिवार में सुख-समृद्धि रहे, संतान की दीर्घायु एवं मान-स मान लक्ष्मी से भरपूर रहे। व्रत का शुभारंभ कई जगहों पर भाद्रपक्ष शुक्ल पक्ष  राधाष्टमी  29 अगस्त के दिन से प्रारंभ कर दिया गया था एवं जिसका समापन 16वें दिन 13 सित बर को होगा। महालक्ष्मी का व्रत हर सुहागवती करती है परंतु इसकी पूजा सार्वजनिक रूप से इकट्ठे होकर महिलाएं करती है। मोहल्ला, नगर, शहर, ग्रामीण इलाके, प्रदेश एवं देश में इसकी पूजा धूमधाम से की जावेगी। श्री महालक्ष्मी जी जलापूर्ति का वरदान प्रदेश को प्रदान करें। कथा ब्राह्मण परिवार की प्रचलित है। दूसरी कथा पांडवों की भी है।

कथा
एक बार महालक्ष्मी का त्यौहार आया। हस्तिनापुर में गांधारी ने नगर की सभी स्त्रियों को पूजा का निमंत्रण दिया परंतु कुंती से नहीं कहा। गंधारी के 100 पुत्रों ने बहुत सी मिट्टी लाकर एक हाथी बनाया और उसे खूब सजाकर महल में बीचों बीच स्थापित किया। सभी स्त्रियों पूजा के थाल ले लेकर गंधारी के महल में जाने लगी। इस पर कुंती बड़ी उदास हो गई। जब पांडवों ने कारण पूछा तो उन्होंने बता दिया कि मैं किसकी पूजा करुं? अर्जुन ने कहा मां! तुम पूजा की तैयारी करो मैं तु हारे लिए जीवित हाथी लाता हूं। अर्जुन इन्द्र के यहां गए और अपनी माता के पूजन हेतु यह ऐरावत को ले आए। माता ने सप्रेम पूजन किया। सभी ने सुना कि कुंती के यहां तो स्वयं इन्द्र का ऐतरावत हाथी आया है तो सभी कुंती के महल की ओर दौड़ पड़े और सभी ने वहां जाकर पूजन किया।

इस व्रत पर सोलह बोल की कहानी सोलह बार कही जाती है और चावल और गेहूं अर्पित किए जाते है।  अमोती दमोतीरानी, पोला पर ऊंचों सो, परपाटन गांव जहां के राजा मगरसेन। दमयंती रानी, कहे कहानी, सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल एक कहानी।

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