सड़क पर लगती है बच्चों की पाठशाला, बीच से फर्राटे भरते हैं वाहन

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प्रदेश में नहीं सुधर रहे शिक्षा के हालात
-शिक्षक हैं, बच्चे हैं पर स्कूल नहीं

भोपाल। मप्र में शिक्षा के क्या हालात हैं, ये किसी से छिपा नहीं है। जबकि हर बच्चे को 14 साल की उम्र तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दिए जाने का कानून है। सरकारें इसके लिए तमाम योजनाएं भी चला रही हैं और पैसा भी पानी की तरह बहा रही हैं, लेकिन शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। कहीं शिक्षकों का अभाव है तो कहीं स्कूल भवन ही नहीं है और बच्चे खुले आसमान के नीचे पढ़ने का मजबूर हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है छतरपुर जिले का। यहां बच्चे सड़क पर बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं। क्योंकि इस शासकीय स्कूल के नाम पर एक भी कमरा नहीं है। लिहाजा शिक्षक जहां भी जगह पाते हैं, वहीं क्लास शुरू कर देते हैं। सड़क पर पढ़ाई के दौरान सामने तेज गति से निकलती गाड़ियां, बाइक, आॅटो हर पल खतरे को दावत देते हैं। फिर भी बच्चों को अपना भविष्य संवारने के लिए रोजाना इन खतरों से खेलना पड़ता है।

सड़क पर चल रहा स्कूल किसी दूर-दराज गांव या पिछड़े इलाके का नहीं है, बल्कि यह स्कूल शहर के वार्ड नंबर पांच में लगने वाले एक शासकीय प्राइमरी विद्यालय का है, जहां 43 बच्चों को तालीम देने के लिए दो सहायक शिक्षक पदस्थ हैं, लेकिन भवन के अभाव में सब के सब मारे-मारे फिर रहे हैं। हालांकि, बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी शिक्षकों पर होती है, लिहाजा जब भी कोई गाड़ी तेजी से नकलती है, तो स्कूल के शिक्षकों की सांसें फूल जाती हैं कि कहीं बच्चों के साथ कोई दुर्घटना न हो जाए।

– आज तक नहीं बन पाया भवन
दरअसल, वार्ड नंबर पांच में आरटीओ के पीछे लगने वाले शासकीय स्कूल में शासन ने शिक्षक तो नियुक्त कर दिया है, पर आज तक कोई भवन नहीं दे पाया, जिसके चलते पिछले चार सालों से यह स्कूल सड़क पर ही संचालित हो रहा है। जिला प्रशासन की तरफ से स्कूल के लिए आज तक कोई पहल नहीं की गई। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता का कहना है कि बच्चे स्कूल तो जाते हैं बस स्कूल नहीं है।

-बिना भवन के जिला प्रशासन ने कैसे दी मान्यता
सोचने वाली बात यह है कि जब कोई प्राइवेट स्कूल को मान्यता दी जाती है तो उसे सभी मानकों पर परखा जाता है। स्कूल भवन कितना बड़ा है, प्ले ग्राउंड है कि नहीं, सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं, कितने शिक्षक हैं इत्यादि। फिर एक शासकीय स्कूल जिसमें भवन ही नहीं है तो फिर जिला प्रशासन ने कैसे खोल दिया।

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